Saturday, September 10, 2005

परिचय









जन्म तिथि- 18-5-1934

जन्म स्थान- मेरठ ( उ.प्र.) भारत

शिक्षा- एम.ए., पी-एच.डी., डी.लिट्.

व्यवसाय- चौंतीस वर्ष वि.वि. के उत्तर-स्नातक महाविद्यालयों में आचार्य/प्राचार्य, अब सेवा निवृत्त।

सम्प्रति- पूर्णत: लेखन को समर्पित

हाइकु रचना- सन् 1978-79 से

प्रकाशन- अब तक नौ हाइकु संग्रह प्रकाशित
* ख़ुशबू का सफ़र (1986)
* लकड़ी का सपना (1988, 1999)
* तरु देवता, पाखी पुरोहित (1997)
* कूकी जो पिकी (2000)
* चाँदी के अरघे में (2000)
* धूप से गप-शप (2002)
* बाबुना जो आएगी (2004)
* आ बैठी गीत-परी (2004)
* अकेला था समय (2004)

पुरस्कार- लगभग दो दर्जन

सम्पर्क-
`काकली' 120 बी/2
साकेत, मेरठ -250003 (उ.प्र.)

दूरभाष- 0121-2654749

***


अन्य जालघरों पर प्रकाशित रचनाएँ

22 हाइकु

रंग डगर
खुशबू का सफ़र
फिर शुरू है ।



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साँस का तारा
नीले मजाऱ पर
अकेला फूल ।



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कुनमुनाया
बादल के कँधे पे
उनींदा चाँद ।



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जपा-कुसुम
खिले, दहके, झरे
तुम न फिरे ।



***

हर सिंगार
रोए, उमर भर
पत्तों पे सोए ।



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उन के बिन
फिर लौट आए हैं
चोटों के दिन ।



***

बादर कारे
जल भरे गुब्बारे
फूटे, बरसे ।



***

कोयल गाती
हरी आम की शाख
आग लगाती ।



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फूलों की टोपी
हरियाली का कुर्त्ता
दूल्हा वसन्त ।



***

बाँसों के बन
मन चली हवा ने
बजाई सीटी ।



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तन फागुन
मन रंग-अबीर
मुग्धा अधीर ।



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ठूँठ भी हँसे
चैत की मस्ती देख
कल्ले फाड़ के ।



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रजनी गंधा
हँसती सारी रात
सुबह सोती ।



***

चिड़ियाँ रानी
चार कनी बाजारा
दो घूँट पानी ।



***

नाचती हवा
डफ़ली बजाता है
प्रेमी महुआ ।



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युवा वैष्णवी
जोगिया टेसू धारे
वन में खड़ी ।



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उगाई मैंने
गुलाब की फ़सल
हाथ घायल ।



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ज़ख्म़ हरे हैं
अपनों ने दिये थे
नहीं भरे हैं ।



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तंदूर तपा
धरती रोटी सिंकी
दहक लाल ।



***

आग की गुफ़ा
भटक गई हवा
जली निकली ।



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मिट्टी का घड़ा
बूँद-बूँद रिसता
लो, खाली हुआ ।



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हँसते साथ
पोपल मुँह और
दूध के दाँत ।
***
-डॉ० सुधा गुप्ता

Sunday, September 04, 2005

20 हाइकु

पीपल-पत्ते
ताली बजाते, देख
बूँदों का नाच ।



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गोघूली बेला

लौटती है रम्भाती
माँ की ममता ।



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दिन बंजारा
फिरता है उदास
मारा-मारा ।



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बैठी मुँडेर
मयूर-नील संझा
पाँखें पसार ।



***

कूकी जो पिकी
`छन्न' दोपहरिया
काँच-सी टूटी ।



***

काकली सुन
नीम का हरा पेड़
बजाता धुन ।



***

पीपल दादा
कहानियाँ सुनते
दिन भर की ।



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डालता चौक
आँसू-भीगी पातियाँ
माघ डाकियाँ ।



***

पूजा को चली
लो, उषा ने सजा ली
सोने की थाली ।



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मचा है शोर
चिड़ियाँ बस्ते खोलें
हो गई भोर ।



***

टहनी पर
लचकती चिड़ियाँ
गातीं प्रभाती ।



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सोने की डाली
शरद-दुपहर
कपूर-घुली ।



***

पका सूरज
खेतों में फैले पड़े
गेहूँ के धान ।



***

शोख़ बोलियाँ
हवा में ठुनकतीं
बुलबुल की ।



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नभ से गिरा
नारंगी फुटबॉल
तरु पे टँगा ।



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फूलों से लदा
भूला होशो हवास
अमल तास ।



***

चहक रही
नोक दार पूँछ को
उठा, फुदकी ।



***

पीली चोंच ने
मारी लम्बी डुबकी
पाई मछली ।



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बजाता फिरे
आवाज़ के घुँघरू
शकर खोरा।



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शिशिरोत्सव
पतझर पहन
पेड़ आए हैं ।
***


-डॉ० सुधा गुप्ता

ग्रीष्म पर कुछ हाइकु


आग का गोला
फट गया सुबह
बिखरे शोले !
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धूप -दारोगा
गश्त पर निकला
आग - बबूला !
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तंदूर तपा
धरती-रोटी सिंकी
दहक लाल !
***

आग की गुफा
भटक गई हवा
जली निकली !
***

फटा पड़ा है
हजार टुकड़ों में
पोखर -दिल !
***

कुपिता धरा
अगन-महल में
आसन-पाटी !
***

धूप से डर
पीली छतरी खोले
खड़ा बैसाख !
***

धूप ने छला
काला हुआ हिरन
पानी न मिला !
***

जेठ की आँच
हवाएँ खौलती हैं
औटते जीव !
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पानी की धुन
सूखे गले भटके
राजा मछेरा !
***

लपटों घिरा
अगिया बैताल-सा
लू का थपेड़ा !
***

कुँए, छबील
प्यास बुझाने वाले
मीत, लापता !
***

-डॉ० सुधा गुप्ता

Saturday, August 20, 2005